Saturday, November 16, 2013

विद्यापति आ विद्यापति पर्व

मिथिला प्राइम : पावनिक एहि मौसममे श्रद्धाक अद्वितीय पावनि छैठ संपन्न होइत गुलाबी ठंडीक सांझमे युवतीक मधुर कंठसं निकलल ‘सामा चकेबा’ कऽ लोकगीतसं मुखरित भऽ उठैत अछि। एकरा संगहि देश भरिमे मैथिल संस्था द्वारा विद्यापति समारोहक आयोजन लेल बंसकट्टी शुरू भऽ जाइत अछि। एकटा लोकोक्तिक अनुसार विद्यापतिक अवसान कार्तिक धवल त्रयोदशीक दिन भेल छल, ओकर दू दिनक बाद कार्तिक पूर्णिमा पड़ैत अछि, जखनकी सरकारी दफ्तरमे गुरु नानक जयंतीक रूपे छुट्टी रहैत अछि मुदा देश-विदेशक मैथिल संस्था लेल त्रयोदशीसं पूर्णिमा धरि तीन दिनक ‘विद्यापति पर्व’ होइत अछि, जेकरा सभ अप्पन-अप्पन सामथ्र्यक अनुसार मनाबैत छथि। हमरा नहि बूझल अछि जे विश्वक कोनो आन कविक जयंती ‘पर्व’ के रूपे मनाएल जाइछ। विद्यापति ‘देसिल बयना’ यानी लोकभाषाक प्रथम शास्त्रीय महाकवि छथि। जखन सभ आभिजात्य वर्ग संस्कृतमे काव्य-रचना कऽ संतुष्टि पाबि रहल छल, मिथिलाक राज-पंडित विद्यापति संस्कृतमे कतेको रचना केलनि, मुदा हुनका लगलगि जे आमजन तक पहुंचबा लेल एहि स्फटिक शिलासं निच्चा उतर कऽ कुश केर चटाई पर बैसय पड़त। तखन ओ उद्घोषणा केलनि ’ देसिल बयना सब जन मिट्ठा’ माने गामक भाषा सभ लेल मीठ होइत अछि। यैह नहि, ओ अप्पन नव काव्य-भाषा केँ बाल चंद्रमा जेना सुन्नर मनलनि-बालचंद बिज्जापइ भासा। हिनकासं पूर्व 12म सदीमे महाकवि जयदेव गीत-गोविंद रचि कऽ अप्पन ललित पदावलीसं शास्त्रीय संगीत, नृत्य, चित्रकला आदि सभ विधा पर कब्जा कऽ लेलनि। विद्यापति गीत-गोविंद केर पदक अनुरूप लोकभाषामे पदक रचना केलनि, ताहि लेल हिनका ‘अभिनव जयदेव’ कहल गेल। संस्कृत पंडित होइत जौँ विद्यापति लोकभाषामे रचनाकर्म दिस प्रवृत्त भेलनि, तऽ ओ एहि पवित्र माटीक प्रताप अछि, जाहिमे जगतजननी सीता जन्म लेलनि। हुनका बाद विराट लोक-आधार पौनिहार परवर्ती कवि गोस्वामी तुलसीदास भेला जिनक भाषा अवधी छल, जे सीताजीक ससुरालक भाषा छल। तुलसी सेहो विद्यापति सन समयमे जन्म लेने छलथि। विद्यापतिक आविर्भाव एहन समयमे भेल, जखन संपूर्ण उत्तर भारत राजनीतिक दृष्टिसं शक्तिहीन, सामाजिक दृष्टिसं विपर्यस्त, आर्थिक दृष्टिसं पंगु आ नैतिक दृष्टिये लुंजपुंज भऽ गेल छल। स्वयं विद्यापति ‘कीर्तिलता’ मे एहि अपकर्षक मार्मिक वर्णन कएने छथि। अनुमानत: 1360 मे मिथिलाक बिस्फी गाममे हिनक जन्म भेल छल। पिता गणपति ठाकुर राजा गगनेश्वर ठाकुरक राजपुरोहित छलथि, एहिलेल, नैनपनमे विद्यापति राज-दरबारमे अबैत-जाइत छलथि। राजा कीर्ति सिंहक दरबारमे रहि विद्यापति सृजन-कार्य शुरु केलनि। गीतक रचना लेल वासंती दौर राजा शिव सिंहक शासन-कालमे आएल। गुणी शासक शिव सिंह आ हुनक प्रेम-सौंदर्यक निधि लखिमा रानीक मधुर सान्निध्य विद्यापति केँ एकसं एक श्रृंगार-गीत रचबाक लेल प्रेरित केलनि। विद्यापति शिवसिंहमे कृष्ण आ लखिमा रानीमे राधाक छवि देखलनि। एहि गीतकेँ अंत:पुरक सेविका गेनाय शुरू केलनि, बादमे राज-दरबारक संगीतज्ञ हिनका राग-रागिनियोंमे बान्हि आ वैष्णव भक्त हिनक प्रचार-प्रसार सुदूर पूर्वोत्तर क्षेत्र धरि जा केलनि। एहि गीतकेँ गाबि धन्य होनिनार वैष्णव संतों-आचार्यमे बंगालक चैतन्य देव, असम केर आचार्य शंकर देव सन युगांतरकारी महापुरुष छलथि। पिछला सदीमे रवींद्रनाथ टैगोर सेहो विद्यापतिक पदकेँ अनुकरणमे कतेको पद लिखलनि, जेकर संग्रह ‘भानुसिंहेर पदावली’ अछि। दुर्भाग्यसं, राज्याभिषेकक साढ़े तीन बरखक बादे राजा शिवसिंह यवन सेनाक संग युद्धमे मारल गेला, जेकरा बाद विरक्त भऽ विद्यापति संस्कृतमे धार्मिक ग्रंथ आ मैथिलीमे भक्तिपरक पदक रचना करय लगला। हुनक लिखल ‘वर्षकृत्य’ आइयो मैथिल समाजक कर्मकांडक अनिवार्य आधार-ग्रंथ अछि। जन-सामान्य केँ संस्कृतमे चिट्ठी सिखेबा लेल ओ ‘लिखनावली’ केर रचना केलनि। अवहट्टमे ओ राजा शिवसिंहक शौर्य, ऐश्वर्य आ श्रृंगारक वर्णन कीर्तिलता आ कीर्ति-पताका मे केलन्हि जे हुनका वीरगाथा कालक आन महाकवि केर पांतिमे ठाढ़ करैत अछि। अप्पन पदावलीक कारणे विद्यापति नेपाली, बांग्ला, ओड़िया, असमिया सभ आधुनिक लोकभाषाक आदिकवि रहला। मिथिलामे विद्यापतिक पद समाजक सभ वर्गमे व्यक्तिक जन्मसं मृत्यु धरि काव्य-अभिव्यक्तिक माध्यम अछि। राधा-कृष्ण-परक श्रृंगार गीतक संगे ओ महेशवानी, नचारी, दुर्गा-स्तुति, गंगा-स्तुति आदि बड्ड लिखने छथि। एहि पदक गायन ‘बिदापत’ नामसं होइत रहल अछि। हुनक निधन 1448 मे भेल। 88 बरखक विद्यापति 15 शासकक संपर्कमे रहला। संस्कृत, अवहट्ट आ कांच मैथिलीमे ओ रचना केलनि। कांच मैथिली एहिलेल कियैक तऽ तखन धरि इ भाषा परिनिष्ठित नहि भेल छल। ओना तऽ विद्यापति पर्व मनेबाक परंपरा रांची-कलकत्तासं लऽ दिल्ली-मुंबई धरि अछि, मुदा अप्पन राज्यक परती जमीन पर मिथिला-मैथिलीक सकारात्मक चेतना जगाबयमे राजधानी पटनामे बसल बुद्धिजीवी द्वारा सत्तर के दशकमे गठित ‘चेतना समिति’ केर भूमिका नोडल रहल अछि। ओहि समय ‘चेतना समिति’ केर विद्यापति पर्व समारोह राज्य विधान सभाक प्रांगणमे मेला सन लगैत छल। स्वर-कोकिला शारदा सिन्हासं लऽ रंजना झा धरि आ हमरा सन कविसं लऽ गायक रवींद्र-महेंद्रक जोड़ी केँ पहिचान एहि मंचसं भेटल। मैथिलकेँ एक मंच पर जुटनाय बड्ड कठिन अछि मुदा इ असंभव काजमे इ संस्था सफल भेल आ सभ वर्ग आ समुदायसं एकरा सहयोग भेटल। एतय तक कि चैरिटी लेल मुख्यमंत्रीक पत्नीसं लऽ उषाकिरण खान, प्रेमलता मिश्र ‘प्रेम’ सन प्रतिष्ठित मैथिलानी एहि मेलामे दोकान लगाबैत छलथि। समय बदल जेबासं इ पावनि सिकुड़ि गेल अछि मुदा ओकर इतिहास स्वर्णिम अक्षरमे लिखल जाएत। देशमे एहि तरहक कतेको संस्था अछि, जे अप्पन गाम-शहरमे विद्यापति केँ माध्यम बना कऽ एकसं एक महत्वपूर्ण काज केलक मुदा मिथिला आइयो विद्यापतिकेँ तकिया तरमे राखि सुइत रहल अछि। ओतय एक्को टा एहन सभागार नहि अछि, जतय राष्ट्रीय स्तरपर नाट्योत्सव कएल जा सकय, जखकि विद्यापति स्वयं नाटककार छलथि। ओ दिन कहिया आएत जखन विद्यापति केँ नाटक ‘गोरक्षा विजय’ आ ‘मणि मंजरी’ केँ मिथिलाक नाट्यप्रेमी अप्पन रंगशालामे मंचित होइत देखता ? # डॉ बुद्धिनाथ मिश्र (वरिष्ठ साहित्यकार)

3 comments:

  1. अहाँक आलेख पड़लहुँ, मुदा आलेखक अंत मे आबि जे स्थापना कयल गेल अछि ओ निराधार अछि आ निराशा केलक । आलेख नवम्बर, 13 मे लिखल गेल अछि । आ अगस्त मे राष्ट्रीय स्तर पर विद्यापतिक मणिमंज्जरी नाटक मंचन श्रीराम सेंटर , नई दिल्ली मे भेल । तेँ आग्रह जे आलेख मे डाटाक जानकारी उचित होयबाक चाही । धन्यवाद ।

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  2. जी, मैलोरंग मणिमंज्जरीक मंचन कएने छल! मुदा जेना आहां केँ बुझल अछि जे इ आलेख पुरान अछि तैँ जे अछि से! आ जौँ एक बेर मणिमंज्जरीक मंचन भेल तऽ नीक गप्प, एहि तरहक नाटकक मंचन लगातार होइत रहबाक चाही!

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